Ahmad Faraz Shayari – ये वफ़ा तो



ये वफ़ा तो उन दिनों की बात ही “फ़राज़”
जब लोग सच्चे और मकान कच्चे हुआ करते थे

Ahmad Faraz Shayari – वो बाज़ाहिर तो मिला था

वो बाज़ाहिर तो मिला था एक लम्हे को फ़राज़
उम्र सारी चाहिए उसको भुलाने के लिए


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Ahmad Faraz Sher O Shayari – हाथ उठाए हैं मगर

हाथ उठाए हैं मगर लब पे दुआ कोई नहीं
की इबादत* भी तो वो जिस की जज़ा* कोई नहीं

ये भी वक़्त आना था अब तू गोश-बर- आवाज़* है
और मेरे बरबते-दिल* में सदा* कोई नहीं

आ के अब तस्लीम कर लें तू नहीं तो मैं सही
कौन मानेगा के हम में बेवफ़ा कोई नहीं

वक़्त ने वो ख़ाक उड़ाई है के दिल के दश्त से
क़ाफ़िले गुज़रे हैं फिर भी नक़्शे-पा* कोई नहीं

ख़ुद को यूँ महसूर* कर बैठा हूँ अपनी ज़ात* में
मंज़िलें चारों तरफ़ है रास्ता कोई नहीं

कैसे रस्तों से चले और किस जगह पहुँचे “फ़राज़”
या हुजूम-ए-दोस्ताँ* था साथ या कोई नहीं

इबादत = पूजा
जजा = प्रतिफल
गोश-बर- आवाज़ = आवाज़ पर कान लगाए हुए
बरबते-दिल = सितार जैसा एक वाद्य यंत्र
सदा = आवाज़्
नक़्शे-पा = पद-चिह्न
महसूर = घिरा हुआ
ज़ात = अस्तित्व
हुजूम-ए-दोस्ताँ = दोस्तों का समूह

Best Ahmad Faraz Shayari – इतना न याद आया करो

इतना न याद आया करो कि रात भर सो न सकें फ़राज़
सुबह को सुर्ख आखों का सबब पूछते हैं लोग


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Ahmad Faraz Sher O Shayari – हर एक बात न क्यों

हर एक बात न क्यों ज़हर सी हमारी लगे
कि हम को दस्ते-ज़माना* से जख्म* कारी* लगे

उदासीयाँ हो मुसलसल* तो दिल नहीं रोता
कभी-कभी हो तो यह कैफीयत* भी प्यारी लगे

बज़ाहिर* एक ही शब* है फराके-यार* मगर
कोई गुज़ारने बैठे तो उमर सारी लगे

इलाज इस दर्दे-दिल-आश्ना* का क्या कीजे
कि तीर बन के जिसे हर्फ़े- ग़मगुसारी* लगे

हमारे पास भी बैठो बस इतना चाहते हैं
हमारे साथ तबियत अगर तुमहारी लगे

‘फराज़’ तेरे जुनूँ* का खयाल है वरना
यह क्या जरूर की वो सूरत सभी को प्यारी लगे

दस्ते-ज़माना = संसार के हाथों
जख्म = घाव
कारी = गहरे
मुसलसल = लगातार
कैफीयत = दशा
बज़ाहिर = प्रत्यक्षत:
शब = रात्रि
फराके-यार = प्रिय की जुदाई
दर्दे-दिल-आश्ना = दर्द को जानने वाले दिल का
हर्फ़े- ग़मगुसारी = सहानुभूति के शब्द
जुनूँ = उन्माद

Ahmad Faraz Ki Famous Gazals – तू कि अन्जान है

तू कि अन्जान है इस शहर के आदाब* समझ
फूल रोए तो उसे ख़ंद-ए-शादाब* समझ

(आदाब = ढंग ,शिष्टाचार, ख़ंद-ए-शादाब = प्रफुल्ल मुस्कान)

कहीं आ जाए मयस्सर* तो मुक़द्दर* तेरा
वरना आसूदगी-ए-दहर* को नायाब* समझ

(मयस्सर = प्राप्य, मुक़द्दर = भाग्य, आसूदगी-ए-दहर = संतोष का युग, नायाब = अप्राप्य)

हसरत-ए-गिरिया* में जो आग है अश्कों में नहीं
ख़ुश्क आँखों को मेरी चश्म-ए-बेआब* समझ

(हसरत-ए-गिरिया = रोने की इच्छा, चश्म-ए-बेआब = बिना पानी की सरिता)

मौजे-दरिया* ही को आवारा-ए-सदशौक़* न कह
रेगे-साहिल* को भी लबे-तिश्ना-सैलाब* समझ

(मौजे-दरिया = नदी की लहर, आवारा-ए-सदशौक़ = कुमार्गी, रेगे-साहिल = तट की मिट्टी, लबे-तिश्ना-सैलाब = बाढ़ के लिए तरसते हुए होंठ)

ये भी वा* है किसी मानूस* किरन की ख़ातिर*
रोज़ने-दर* को भी इक दीदा-ए-बेख़्वाब* समझ

(वा = खुला हुआ, मानूस = परिचित, रोज़ने-दर = द्वार का छिद्र, दीदा-ए-बेख़्वाब = जागती आँख)

अब किसे साहिल-ए-उम्मीद* से तकता है ‘फ़राज़’
वो जो इक कश्ती-ए-दिल थी उसे ग़र्क़ाब* समझ

(साहिल-ए-उम्मीद = आशा के तट, ग़र्क़ाब = डूबी हुई)


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