Hindi Ghazals By Ahmad Faraz – जो भी दुख याद न था

जो भी दुख याद न था याद आया
आज क्या जानिए क्या याद आया

याद आया था बिछड़ना तेरा
फिर नहीं याद कि क्या याद आया

हाथ उठाए था कि दिल बैठ गया
जाने क्या वक़्त-ए-दुआ याद आया

जिस तरह धुंध में लिपटे हुए फूल
इक इक नक़्श तेरा याद आया

ये मोहब्बत भी है क्या रोग ‘फ़राज़’
जिसको भूले वो सदा याद आया

ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे

ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे

हमसफ़र चाहिये हूज़ूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी काफ़िला है मुझे

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे

लबकुशा* हूं तो इस यकीन के साथ
कत्ल होने का हौसला है मुझे

दिल धडकता नहीं सुलगता है
वो जो ख्वाहिश थी, आबला* है मुझे

कौन जाने कि चाहतों में फ़राज़
क्या गंवाया है क्या मिला है मुझे

लबकुशां = बोलने वाला
आबला = फफोला, छाला