Hindi Ghazal Sher O Shayar – गर तेरी गली में



गर तेरी गली में आना जाना बना लिया होता
तो अब तक तुझको दीवाना बना लिया होता
हमको तो इस महफ़िल में आना था
वरना कोई भी बहाना बना लिया होता
अच्छा हुआ हम ज़मीन पर ही रहे
वरना अब तक निशाना बना लिया होता
इस तरह दर-ब-दर नहीं भटक रहे होते
गर कहीं कोई ठिकाना बना लिया होता
हम तो बस तेरे इंतज़ार में रह गए
वरना कोई दूसरा आशियाना बना लिया होता


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Ahmad Faraz Sher O Shayari – हाथ उठाए हैं मगर

हाथ उठाए हैं मगर लब पे दुआ कोई नहीं
की इबादत* भी तो वो जिस की जज़ा* कोई नहीं

ये भी वक़्त आना था अब तू गोश-बर- आवाज़* है
और मेरे बरबते-दिल* में सदा* कोई नहीं

आ के अब तस्लीम कर लें तू नहीं तो मैं सही
कौन मानेगा के हम में बेवफ़ा कोई नहीं

वक़्त ने वो ख़ाक उड़ाई है के दिल के दश्त से
क़ाफ़िले गुज़रे हैं फिर भी नक़्शे-पा* कोई नहीं

ख़ुद को यूँ महसूर* कर बैठा हूँ अपनी ज़ात* में
मंज़िलें चारों तरफ़ है रास्ता कोई नहीं

कैसे रस्तों से चले और किस जगह पहुँचे “फ़राज़”
या हुजूम-ए-दोस्ताँ* था साथ या कोई नहीं

इबादत = पूजा
जजा = प्रतिफल
गोश-बर- आवाज़ = आवाज़ पर कान लगाए हुए
बरबते-दिल = सितार जैसा एक वाद्य यंत्र
सदा = आवाज़्
नक़्शे-पा = पद-चिह्न
महसूर = घिरा हुआ
ज़ात = अस्तित्व
हुजूम-ए-दोस्ताँ = दोस्तों का समूह

Ahmad Faraz Sher O Shayari – हर एक बात न क्यों

हर एक बात न क्यों ज़हर सी हमारी लगे
कि हम को दस्ते-ज़माना* से जख्म* कारी* लगे

उदासीयाँ हो मुसलसल* तो दिल नहीं रोता
कभी-कभी हो तो यह कैफीयत* भी प्यारी लगे

बज़ाहिर* एक ही शब* है फराके-यार* मगर
कोई गुज़ारने बैठे तो उमर सारी लगे

इलाज इस दर्दे-दिल-आश्ना* का क्या कीजे
कि तीर बन के जिसे हर्फ़े- ग़मगुसारी* लगे

हमारे पास भी बैठो बस इतना चाहते हैं
हमारे साथ तबियत अगर तुमहारी लगे

‘फराज़’ तेरे जुनूँ* का खयाल है वरना
यह क्या जरूर की वो सूरत सभी को प्यारी लगे

दस्ते-ज़माना = संसार के हाथों
जख्म = घाव
कारी = गहरे
मुसलसल = लगातार
कैफीयत = दशा
बज़ाहिर = प्रत्यक्षत:
शब = रात्रि
फराके-यार = प्रिय की जुदाई
दर्दे-दिल-आश्ना = दर्द को जानने वाले दिल का
हर्फ़े- ग़मगुसारी = सहानुभूति के शब्द
जुनूँ = उन्माद

Ahmad Faraz Ki Famous Gazals – तू कि अन्जान है

तू कि अन्जान है इस शहर के आदाब* समझ
फूल रोए तो उसे ख़ंद-ए-शादाब* समझ

(आदाब = ढंग ,शिष्टाचार, ख़ंद-ए-शादाब = प्रफुल्ल मुस्कान)

कहीं आ जाए मयस्सर* तो मुक़द्दर* तेरा
वरना आसूदगी-ए-दहर* को नायाब* समझ

(मयस्सर = प्राप्य, मुक़द्दर = भाग्य, आसूदगी-ए-दहर = संतोष का युग, नायाब = अप्राप्य)

हसरत-ए-गिरिया* में जो आग है अश्कों में नहीं
ख़ुश्क आँखों को मेरी चश्म-ए-बेआब* समझ

(हसरत-ए-गिरिया = रोने की इच्छा, चश्म-ए-बेआब = बिना पानी की सरिता)

मौजे-दरिया* ही को आवारा-ए-सदशौक़* न कह
रेगे-साहिल* को भी लबे-तिश्ना-सैलाब* समझ

(मौजे-दरिया = नदी की लहर, आवारा-ए-सदशौक़ = कुमार्गी, रेगे-साहिल = तट की मिट्टी, लबे-तिश्ना-सैलाब = बाढ़ के लिए तरसते हुए होंठ)

ये भी वा* है किसी मानूस* किरन की ख़ातिर*
रोज़ने-दर* को भी इक दीदा-ए-बेख़्वाब* समझ

(वा = खुला हुआ, मानूस = परिचित, रोज़ने-दर = द्वार का छिद्र, दीदा-ए-बेख़्वाब = जागती आँख)

अब किसे साहिल-ए-उम्मीद* से तकता है ‘फ़राज़’
वो जो इक कश्ती-ए-दिल थी उसे ग़र्क़ाब* समझ

(साहिल-ए-उम्मीद = आशा के तट, ग़र्क़ाब = डूबी हुई)


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Ahmad Faraz Ki Famous Gazals – बुझी नज़र तो करिश्मे

बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो शब* के गये
के अब तलक नही पलटे हैं लोग कब के गये

करेगा कौन तेरी बेवफ़ाइयों का गिला*
यही है रस्मे ज़माना तो हम भी अब के गये

मगर किसी ने हमे हमसफ़र नही जाना
ये और बात के हम साथ साथ सब के गये

अब आये हो तो यहाँ क्या है देखने के लिये
ये शहर कब से है वीरां वो लोग कब के गये

गिरफ़्ता दिल* थे मगर हौसला नही हारा
गिरफ़्ता दिल हैं मगर हौसले भी अब के गये

तुम अपनी शम्ऐ-तमन्ना को रो रहे हो “फ़राज़”
इन आँधियों मे तो प्यारे चिराग सब के गये

रोज़ो-शब = क़यामत और हश्र तक दिन-रात
गिला = शिकायत
गिरफ़्ता दिल = उदास दिल

Hindi Ghazal Lyrics – बिखरती रेत पर किस

बिखरती रेत पर किस नक़्शे को आबाद रखेगी?
वो मुझको याद रखे भी तो कितना याद रखेगी?
उसे बुनियाद रखनी है अभी दिल में मुहब्बत की
मगर ये नींव वो मेरे बाद रखेगी!
पलट कर भी नहीं देखी उसी की ये बेरुखी हमने!
भुला देंगे उसे ऐसा कि वो भी हमें याद रखेगी !!

Ghazal Shayari Hindi Mein – अपनी आदत है

अपनी आदत है हम गम में भी जी लेते हैं
अश्कों के जाम हम हंस-हंस के भी पी लेते हैं।
उनको क्या बात करें जो बहारों
को खिंज़ा मेम, बदल देते हैं
एक हम हैं कि उनके जख्मों को
सीने में लिए फ़िरते हैं
अपनी आदत है रातों में उठकर
हम ज़िन्दगी की राह देखा करते हैं ।
फूलों की सेज पर, वहीं वह किसी के
गले का हार बना करते हैं।
अपनी यह आदत है हम फिर भी
उनके ख्यालों मैं जिया करते हैं।
अश्कों के जाम हम हँस-हँ के
पिया करते हैं।


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Ahmad Faraz Ki Famous Gazals – अजब जूनून ए मुसाफ़त

अजब जूनून-ए-मुसाफ़त* में घर से निकला था
ख़बर नहीं है कि सूरज किधर से निकला था

ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया
अभी अभी तो अज़ाब-ए-सफ़र* से निकला था

ये तीर दिल में मगर बे-सबब* नहीं उतरा
कोई तो हर्फ़* लब-ए-चारागर* से निकला था

मैं रात टूट के रोया तो चैन से सोया
कि दिल का दर्द मेरे चश्म-ए-तर* से निकला था

वो कैसे अब जिसे मजनू पुकारते हैं ‘फ़राज़’
मेरी तरह कोई दिवाना-गर से निकला था

जूनून-ए-मुसाफ़त = सफर का जूनून
अज़ाब-ए-सफ़र = यात्रा की सजा, सफर की पीड़ा
बे-सबब = बिना किसी कारण, अकारण
हर्फ़ = शब्द
लब-ए-चारागर = इलाज़ करने वाले के होंठ
चश्म-ए-तर = गीली आँखे, आंसुओं से भरी आँखे

Ahmad Faraz Ki Ghazal Shayari – वो पैमान* भी टूटे जिनको

वो पैमान* भी टूटे जिनको
हम समझे थे पाइंदा*

वो शम्एं भी दाग हैं जिनको
बरसों रक्खा ताबिंदा*

दोनों वफ़ा करके नाख़ुश हैं
दोनों किए पर शर्मिन्दा

प्यार से प्यारा जीवन प्यारे
क्या माज़ी* क्या आइंदा*

हम दोनों अपने क़ातिल हैं
हम दोनों अब तक ज़िन्दा।

ख़ुदकुशी = आत्महत्या
पैमान = वचन
पाइंदा = अनश्वर
ताबिंदा = प्रकाशमान
माज़ी = अतीत
आइंदा = भविष्यकाल

Ahmad Faraz Sher O Shayari – कुर्बत भी नहीं दिल से

कुर्बत* भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता
वो शख़्स कोई फ़ैसला कर भी नहीं जाता

आँखें हैं के खाली नहीं रहती हैं लहू से
और ज़ख्म-ए-जुदाई है के भर भी नहीं जाता

वो राहत-ए-जान* है इस दरबदरी में
ऐसा है के अब ध्यान उधर भी नहीं जाता

हम दोहरी अज़ीयत* के गिरफ़्तार मुसाफ़िर
पाऔं भी हैं शील शौक़-ए-सफ़र भी नहीं जाता

दिल को तेरी चाहत पर भरोसा भी बहुत है
और तुझसे बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता

पागल होते हो ‘फ़राज़’ उससे मिले क्या
इतनी सी ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता

कुर्बत = मोहब्बत, प्यार
राहत-ए-जान = मन को प्रसन्न करने वाली
अज़ीयत = किसी को पहुंचाई जाने वाली पीड़ा, अत्याचार


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