Ahmad Faraz Sher O Shayari – मैं तो मकतल

मैं तो मकतल* में भी किस्मत का सिकंदर निकला
कुर्रा-ए-फाल* मेरे नाम का अक्सर निकला

था जिन्हें जौम*, वो दरया भी मुझी में डूबे
मैं के सेहरा* नज़र आता था, समंदर निकला
मैं ने उस जान-ए-बहारां को बुहत याद किया
जब कोई फूल मेरी शाख-ए-हुनर पर निकला

शहर वालों की मुहब्बत का मैं कायल हूँ मगर
मैंने जिस हाथ को चूमा, वो ही खंज़र निकला

तू यहीं हार गया था मेरे बुजदिल दुश्मन
मुझ तन्हा के मुकाबिल, तेरा लश्कर* निकला

मैं के सहरा-ए-मुहब्बत का मुसाफ़िर हूँ ‘फ़राज़’
एक झोंका था कि ख़ुशबू के सफ़र पर निकला

मकतल = युद्ध का मैदान
कुर्रा-ए-फाल = मौत का फरमान
जौम = घमंड
सेहरा = रेगिस्तान
लश्कर = सैनिको की टुकड़ी