Ahmad Faraz Ki Ghazal Shayari – फ़राज़ अब कोई सौदा

फ़राज़ अब कोई सौदा कोई जूनून भी नहीं
मगर करार से दिन कट रहे होँ यूँ भी नहीं

लब-ओ-दहन* भी मिला गुफ्तगू* का फन भी
मगर जो दिल पे गुज़रती है कह सकूं भी नहीं

मेरी जुबां की लुकनत* से बदगुमान* न हो
जो तू कहे तो उमर भर मिलूँ भी नहीं

फ़राज़ जैसे कोई दिया तुर्बत-ए-हवा* चाहे है
तू पास आये तो मुमकिन है मैं रहूँ भी नहीं
* लब-ओ-दहन = होंठ और मुंह
* गुफ्तगू = बातचीत
* लुकनत = हकलाअट
*बदगुमान = शक्की, संदेह करने वाला
* तुर्बत = कब्र