Ahmad Faraz Ki Famous Gazals – रोग ऐसे भी ग़म ए यार

रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं
दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं

इश्क आगाज़* में हलकी सी खलिश* रखता है
बाद में सैकड़ों आज़ार* से लग जाते हैं

पहले पहल हवस इक-आध दुकां खोलती है
फिर तो बाज़ार के बाज़ार से लग जाते है

बेबसी भी कभी कुर्बत* का सबब* बनती है
रो न पायें तो गले यार के लग जाते हैं

कतरनें ग़म की जो गलियों में उडी फिरती है
घर में ले आओ तो अम्बार से लग जाते है

दाग़ दामन के हों, दिल के हों या चेहरे के फ़राज़
कुछ निशाँ उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं

आगाज़ = शुरुआत
खलिश = दर्द
आज़ार = दर्द
कुर्बत = प्यार
सबब = कारण