Ahmad Faraz Ki Famous Gazals – अजब जूनून ए मुसाफ़त

अजब जूनून-ए-मुसाफ़त* में घर से निकला था
ख़बर नहीं है कि सूरज किधर से निकला था

ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया
अभी अभी तो अज़ाब-ए-सफ़र* से निकला था

ये तीर दिल में मगर बे-सबब* नहीं उतरा
कोई तो हर्फ़* लब-ए-चारागर* से निकला था

मैं रात टूट के रोया तो चैन से सोया
कि दिल का दर्द मेरे चश्म-ए-तर* से निकला था

वो कैसे अब जिसे मजनू पुकारते हैं ‘फ़राज़’
मेरी तरह कोई दिवाना-गर से निकला था

जूनून-ए-मुसाफ़त = सफर का जूनून
अज़ाब-ए-सफ़र = यात्रा की सजा, सफर की पीड़ा
बे-सबब = बिना किसी कारण, अकारण
हर्फ़ = शब्द
लब-ए-चारागर = इलाज़ करने वाले के होंठ
चश्म-ए-तर = गीली आँखे, आंसुओं से भरी आँखे