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Ahmad Faraz Sher O Shayari – हर एक बात न क्यों

हर एक बात न क्यों ज़हर सी हमारी लगे
कि हम को दस्ते-ज़माना* से जख्म* कारी* लगे

उदासीयाँ हो मुसलसल* तो दिल नहीं रोता
कभी-कभी हो तो यह कैफीयत* भी प्यारी लगे

बज़ाहिर* एक ही शब* है फराके-यार* मगर
कोई गुज़ारने बैठे तो उमर सारी लगे

इलाज इस दर्दे-दिल-आश्ना* का क्या कीजे
कि तीर बन के जिसे हर्फ़े- ग़मगुसारी* लगे

हमारे पास भी बैठो बस इतना चाहते हैं
हमारे साथ तबियत अगर तुमहारी लगे

‘फराज़’ तेरे जुनूँ* का खयाल है वरना
यह क्या जरूर की वो सूरत सभी को प्यारी लगे

दस्ते-ज़माना = संसार के हाथों
जख्म = घाव
कारी = गहरे
मुसलसल = लगातार
कैफीयत = दशा
बज़ाहिर = प्रत्यक्षत:
शब = रात्रि
फराके-यार = प्रिय की जुदाई
दर्दे-दिल-आश्ना = दर्द को जानने वाले दिल का
हर्फ़े- ग़मगुसारी = सहानुभूति के शब्द
जुनूँ = उन्माद




Updated: January 21, 2017 — 4:29 pm

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