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Ahmad Faraz Sher O Shayari – दिल बहलता है

दिल बहलता है कहाँ अंजुमो-महताब से भी
अब तो हमलोग गए दीदा-ए-महताब से भी

(अंजुमो-महताब = चाँद तारों; दीदा-ए-महताब = चाँद देखने)

रो पडा हूँ तो कोई बात ही ऐसी होगी
मैं कि वाकिफ था तेरे हिज्र के आदाब से भी

(वाकिफ = परिचित; हिज्र = विरह; आदाब = जुदाई के ढंग)

कुछ तो उस आँख का शेवा है खफा हो जाना
और कुछ भूल हुई है दिल-ए-बेताब से भी

(शेवा = आदत; दिल-ए-बेताब = बेचैन दिल)

ऐ समंदर की हवा तेरा करम भी मालूम
प्यास साहिल की तो बुझती नहीं सैलाब से भी

(करम = कृपा; साहिल = किनारे; सैलाब = बाढ)

कुछ तो उस हुस्न को जाने है जमाना सारा
और कुछ बात चली है मेरे अहबाब से भी

(अहबाब = दोस्त, परिचित)

दिल कभी गम के समंदर का शनावर था ‘फराज़’
अब तो खौफ आता है इक मौजए-पायाब से भी

(शनावर – तैरने वाला; मौजए-पायाब – छिछला जवार)




Updated: January 21, 2017 — 4:26 pm

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