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Ahmad Faraz Sher O Shayari – किस को गुमाँ है

किस को गुमाँ* है अब के मेरे साथ तुम भी थे
हाय वो रोज़ो-शब* कि मेरे साथ तुम भी थे

यादश बखैर* अहदे-गुजशता* की सोहबतें*
एक दौर था अजब कि मेरे साथ तुम भी थे

बे-महरी-ए-हयात* की शिददत के बावजूद
दिल मुतमईन* था जब कि मेरे साथ तुम भी थे

मैं और तकाबिले-गमे-दौराँ* का हौसला
कुछ बन गया सबब* कि मेरे साथ तुम भी थे

इक खवाब हो गई है रहो-रसम* दोस्ती
एक वहम सा है अब कि मेरे साथ तुम भी थे

वो बज़म मेरे दोस्त याद तो होगी तुम्हें ‘फराज़’,
वो महफिले-तरब* कि मेरे साथ तुम भी थे

गुमाँ = भ्रम
रोज़ो-शब = रात दिन
बखैर = अचछी याद
अहदे-गुजशता = बीते दिनों की
सोहबतें = साथ
बे-महरी-ए-हयात = मूल्यहीन जीवन
मुतमईन = संतुष्ट
सबब = कारण
तकाबिले-गमे-दौराँ = दुखों के समय की तुलना
रहो-रसम = प्रेम व्यवहार
बज़म = महफिल
महफिले-तरब = अचछी महफिल, खुशी की महफिल




Updated: January 21, 2017 — 4:17 pm

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