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Ahmad Faraz Ki Ghazal Shayari – रंजिश ही सही

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

पहले से मरासिम* न सही, फिर भी कभी तो
रस्मों-रहे* दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत* का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिरिया* से भी महरूम*
ऐ राहत-ए-जाँ* मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम* को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आखिरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ

माना की मुहब्बत का छिपाना है मुहब्बत
चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ

जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ

* मरासिम – प्रेम-व्यहवार
* रस्मों-रहे – सांसारिक शिष्टाचार
* पिन्दार-ए-मोहब्बत – प्रेम का गर्व
* लज़्ज़त-ए-गिरिया – रोने का स्वाद
* महरूम – वंचित
* राहत-ए-जाँ – प्राणाधार
* दिल-ए-ख़ुशफ़हम – किसी की ओर से अच्छा विचार रखने वाला मन





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Updated: January 21, 2017 — 2:16 pm

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