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Ahmad Faraz Ki Ghazal Shayari – छोड़ पैमाने वफ़ा

छोड़ पैमाने-वफ़ा* की बात शर्मिंदा न कर
दूरियाँ ,मजबूरियाँ, रुस्वाइयाँ*, तन्हाइयाँ
कोई क़ातिल ,कोई बिस्मिल,* सिसकियाँ, शहनाइयाँ
देख ये हँसता हुआ मौसिम है मौज़ू-ए-नज़र*

वक़्त की रौ में अभी साहिल* अभी मौजे-फ़ना*
एक झोंका एक आँधी,इक किरन , इक जू-ए-ख़ूँ*
फिर वही सहरा का सन्नाटा, वही मर्गे-जुनूँ[13]
हाथ हाथों का असासा* ,हाथ हाथों से जुदा*
जब कभी आएगा हमपर भी जुदाई का समाँ
टूट जाएगा मिरे दिल में किसी ख़्वाहिश का तीर
भीग जाएगी तिरी आँखों में काजल की लकीर
कल के अंदेशों* से अपने दिल को आज़ुर्दा* न कर
देख ये हँसता हुआ मौसिम, ये ख़ुशबू का सफ़र

पैमाने-वफ़ा = वफ़ादारी का संकल्प
रुस्वाइयाँ = बदनामियाँ
बिस्मिल = घायल
मौज़ू-ए-नज़र = चर्चा का विषय
साहिल = किनारा,तट
मौजे-फ़ना = मृत्यु-लहर
जू-ए-ख़ूँ = ख़ून की नदी
मर्गे-जुनूँ = दीवानेपन की मृत्यु
असासा = पूँजी
जुदा = अलग
अंदेशों = पूर्वानुमान
आज़ुर्दा = पीड़ित




Updated: January 21, 2017 — 4:32 pm

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