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Ahmad Faraz Ki Famous Gazals – तड़प उठूँ भी तो

तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम तेरी दुहाई न दूँ
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी तुझे दिखाई न दूँ

तेरे बदन में धड़कने लगा हूँ दिल की तरह
ये और बात के अब भी तुझे सुनाई न दूँ

ख़ुद अपने आपको परखा तो ये नदामत है
के अब कभी उसे इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई न दूँ

मेरी बका ही मेरी ख़्वाहिश-ए-गुनाह में है
मैं ज़िन्दगी को कभी ज़हर-ए-पारसाई* न दूँ

जो ठन गई है तो यारी पे हर्फ़* क्यूँ आए
हरीफ़-ए-जाँ* को कभी तान-ए-आशनाई* न दूँ

ये हौसला भी बड़ी बात है शिकस्त के बाद
की दुसरो को तो इलज़ाम-ए-ना-रसाई न दूँ

मुझे भी ढूँढ कभी मह्व-ए-आईनादारी*
मैं तेरा अक़्स हूँ लेकिन तुझे दिखाई न दूँ

‘फ़राज़’ दौलत-ए-दिल है मता-ए-महरूमी*
मैं जाम-ए-जम के एवज़ कासा-ए-गदाई* न दूँ

मह्व-ए-आईनादारी = आईने को पकड़ने में व्यस्त
बका = अमरता, स्थायित्व
ज़हर-ए-पारसाई = भक्ति के तहत
हर्फ़ = कलंक
हरीफ़-ए-जाँ = जीवन की प्रतिद्वंद्वी
तान-ए-आशनाई = परिचित का ताना
मता-ए-महरूमी = अभाव की वस्तु
कासा-ए-गदाई = भिखारी का कटोरा




Updated: January 21, 2017 — 3:11 pm

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