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Ahmad Faraz Ki Famous Gazals – अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते

अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और
उस कू-ए-मलामत* में गुजरते कोई दिन और

रातों के तेरी यादों के खुर्शीद* उभरते
आँखों में सितारे से उभरते कोई दिन और

हमने तुझे देखा तो किसी और को ना देखा
ए काश तेरे बाद गुजरते कोई दिन और

राहत थी बहुत रंज* में हम गमतलबों* को
तुम और बिगड़ते तो संवरते कोई दिन और

गो तर्के-तअल्लुक* था मगर जाँ पे बनी थी
मरते जो तुझे याद ना करते कोई दिन और

उस शहरे-तमन्ना से ‘फ़राज़’ आये ही क्यों थे
ये हाल अगर था तो ठहरते कोई दिन और

कू-ए-मलामत – ऐसी गली, जहाँ व्यंग्य किया जाता हो
खुर्शीद – सूर्य
रंज – तकलीफ़
गमतलब- दुख पसन्द करने वाले
तर्के-तअल्लुक – रिश्ता टूटना( यहाँ संवाद हीनता से मतलब है)




Updated: January 21, 2017 — 3:30 pm

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